MP में दक्षिण अफ्रीका से आई टीम, हेलिकॉप्टर से पकड़े हिरण, नीलगाय
Last Updated: अक्टूबर 20, 2025 " 04:31 अपराह्न"
Bhopal_ shajapur: मध्यप्रदेश में दक्षिण अफ्रीका की टीम की मदद से वन विभाग द्वारा कालापीपल क्षेत्र के ग्राम इमली खेड़ा में सोमवार सुबह हेलीकॉप्टर से हांका लगाकर नीलगाय , हिरण पकड़े हैं। साउथ अफ्रीका के विशेषज्ञों की मदद से बोमा पद्धति से यह पूरा अभियान चलाया जा रहा है।हेलीकॉप्टर से हांका लगाकर झुंड को सोमवार को बोमा तक लाया गया। इसके बाद बोमा के आखिरी छोर पर लगे वाहनों में यह हिरण पहुंचे।
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वाहनों में पहुंचने के बाद इन्हें अलग-अलग किया जाएगा और परीक्षण भी होगा फिर इन्हें अन्यत्र भेजा जाएगा। बता दें कि 15 अक्टूबर से इस अभियान की शुरुआत हुई है। 19 अक्टूबर तक शुरुआती पांच दिन तैयारी में ही बीत गए। जिससे अभियान की गति पर सवाल खड़े हो रहे थे। हालांकि छठवें दिन दीपावली की सुबह पहली बार हेलीकॉप्टर से हांका लगाया गया और हिरणों, नीलगाय को पकड़ा गया। यह अभियान पांच नवंबर तक चलना है और 10 स्थान से नीलगाय व कृष्णमृग पकड़े जाना है।
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अभयारण्य में चीतों का बनेंगे भोजन-
श्योपुर के कूनो अभयारण्य के बाद मंदसौर जिले में स्थित गांधीसागर अभयारण्य चीतों का दूसरा घर बना है। जिले से पकड़े गये नीलगाय और कृष्ण मृग को गांधी सागर अभयारण्य में ही छोड़ा जाएगा, जो चीतों का प्राकृतिक भोजन बनेंगे। जिले में नीलगाय और कृष्णमृग बड़ी संख्या में हैं। शुरूआत में 400 कृष्णमृग एवं 100 नीलगाय को शिफ्ट किया जाएगा। इसके लिए हेलीकॉप्टर से हांका लगाया जाएगा।
नीलगाय और कृष्णमृग की मौजूदगी वाले स्थानों का सर्वे वन विभाग द्वारा किया जा चुका है। नीलगाय और कृष्णमृग फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। इसे लेकर कई बार किसानों द्वारा प्रदर्शन करने के साथ ज्ञापन दिए गए। प्रदेश की शिवराजसिंह सरकार के समय स्कूल शिक्षा मंत्री इंदरसिंह परमार इस समस्या को विधानसभा में भी उठा चुके हैं।
यह है बोमा पद्धति
साउथ अफ्रीका (South Africa) की बोमा तकनीक में नीलगाय, कृष्णमृग को पकड़ने के लिए पूरा वातावरण तैयार किया जाता है। कम रिहायशी क्षेत्र व बिना हलचल वाले क्षेत्र से रास्ता जैसा बनाया जाता है और इसे हराभरा दिखाया जाता है। जानवरों के लिए खानपान भी रख दिया जाता है। बोमा पद्धति से नीलगाय, कृष्णमृग को पकड़ने के लिए उन्हें बोमा की तरफ घेरा जाता है।
बोमा का अंतिम छोर संकरा रहता है और जानवरों को रखने के लिए लगे पिंजरे या वाहन की ओर खुलता है। जिससे की जानवर आसानी से उस तक पहुंच जाएं। जानवरों की मौजदूगी पर नजर रखने के लिए ड्रोन कैमरों व अन्य संसाधनों की मदद भी ली जा रही है।