धामनोद में “प्रश्न” नहीं, जवाबदेही गायब है, यह स्थानीय स्वराज की सेहत की रिपोर्ट है।
Last Updated: जुलाई 23, 2026 " 10:23 पूर्वाह्न"
Ratlam:धामनोद में “प्रश्न” नहीं, जवाबदेही गायब है, यह स्थानीय स्वराज की सेहत की रिपोर्ट है।
रतलाम(स्पष्ट खबर)। लोकतंत्र की सबसे बुनियादी शर्त है जवाबदेही। जब जनता का चुना हुआ प्रतिनिधि हिसाब मांगे और अधिकारी “फाइल एजेंडे में नहीं थी” कहकर पल्ला झाड़ लें, तो समझिए सिस्टम में कहीं न कहीं पेंच है। धामनोद नगर परिषद में इन दिनों जो हो रहा है, वह इसी पेंच का नमूना है। वह केवल दो पार्षदों की शिकायत नहीं है, यह स्थानीय स्वराज की सेहत की रिपोर्ट है।
यहां मामला केवल डीजल खर्च या अतिक्रमण की जानकारी का नहीं है। मामला उस प्रक्रिया का है जिसके सहारे सवालों को ठंडे बस्ते में डाला जा रहा है।
वार्ड 11 के पार्षद मुकेश चौधरी ने 21 मई को डीजल खर्च का ब्यौरा मांगा। वार्ड 4 के पार्षद मदनलाल पाटीदार ने 1 जून को अतिक्रमण पर कार्रवाई का ब्यौरा मांगा। दोनों आवेदनों पर कार्यालय की प्राप्ति मुहर है। लेकिन 17 जुलाई की सामान्य सभा में दोनों को CMO का एक ही जवाब मिला – “यह विषय एजेंडे में शामिल नहीं था।”
अब सबसे गंभीर बात। नगर परिषद की प्रक्रिया कहती है कि सामान्य सभा का एजेंडा अध्यक्ष के अनुमोदन और हस्ताक्षर के बाद ही जारी होता है। एजेंडे में क्या आएगा, यह तय करने का अधिकार भी अध्यक्ष का है।
धामनोद में अध्यक्ष पद पर भाजपा की दुर्गा अजय डिंडोर हैं। यानी सत्ता भी उनकी, हस्ताक्षर भी उनके। फिर भी बैठक में उन्होंने कहा “हमें इस पत्र की जानकारी ही नहीं है।”
यहां दो ही स्थितियां हो सकती हैं। पहली: प्राप्ति के बाद भी फाइलें अध्यक्ष तक पहुंची ही नहीं। इसका मतलब अधिकारी मनमानी कर रहे हैं। दूसरी: फाइलें पहुंचीं, पर एजेंडे में नहीं डाली गईं। इसका मतलब जानबूझकर असहज सवालों को टाला जा रहा है।
दोनों ही सूरत में दोषी कौन? और जिम्मेदार कौन?
“एजेंडे में नहीं” अब तकनीकी शब्द नहीं रहा। यह एक कवच बन गया है। इसके पीछे सार्वजनिक धन का हिसाब भी छुपाया जा रहा है और जनहित के सवाल भी। डीजल में अनियमितता की आशंका हो या अतिक्रमण पर कार्रवाई, ये कोई “ऐच्छिक” विषय नहीं हैं। ये नगर परिषद के मूल काम हैं।
CMO का कहना है नियम के अनुसार काम हुआ है, अध्यक्ष की अनुमति से अगली बैठक में बता देंगे। पर सवाल यह है कि डेढ़ महीने तक एक प्राप्त आवेदन एजेंडे तक क्यों नहीं पहुंचा?
अगर सत्तापक्ष के अध्यक्ष को ही फाइलों की खबर नहीं लग रही, तो विपक्ष और आम जनता किससे उम्मीद करे?
कलेक्टर रतलाम के पास अब गेंद है। उन्हें तय करना है कि यह महज “प्रक्रियागत चूक” है या “जानकारी दबाकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा” देने का मामला। धामनोद की इस लड़ाई का फैसला सिर्फ दो पार्षदों की जीत-हार तय नहीं करेगा। यह तय करेगा कि नगर परिषद में चलती है “पर्दादारी” या पार्दर्शिता/जवाबदेही”।