प्वॉइंट ऑफ नो रिटर्नः पायलट के खिलाफ कार्रवाई कर दोबारा गलती तो नहीं कर रही कांग्रेस!
Last Updated: जुलाई 14, 2020 " 04:34 अपराह्न"
राजस्थान में राजनीतिक संकट अब अंपनी पूर्णाहुति की ओर है। बागी और डिप्टी सीएम रहे सचिन पायलट को मंत्री के साथ-साथ पीसीसी अध्यक्ष पद से भी हटा दिया गया है। इधर, पायलट ने ट्विटर पर अपनी प्रोफाइल बदलकर संकेत दे दिया है कि वे अब भी समझौते को तैयार नहीं हैं।
जयपुर: राजस्थान में सियासी ड्रामा मंगलवार को भी जारी है। ताजा घटनाक्रम में कांग्रेस विधायक दल की दूसरी बैठक के बाद सचिन पायलटको प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और अशोक गहलोत सरकार में मंत्री पद से भी हटा दिया गया है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच की नूराकुश्ती अब प्वॉइंट ऑफ नो रिटर्न पर पहुंचती हुई दिख रही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व भी यही मान कर चल रहा है।
सूत्रों के मुताबिक सोमवार पूरे दिन कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi) सहित पार्टी के कई वरिष्ठ नेता पायलट को मनाने में लगे रहे, लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। बताया जा रहा है कि पायलट ने पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) और प्रियंका गांधी के फोन कॉल्स का भी जवाब नहीं दिया। स्पष्ट है कि उनकी नाराजगी गंभीर है, लेकिन क्या यह इतनी गंभीर है कि कांग्रेस से अलगाव ही इसका एकमात्र समाधान हो सकता है।
प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटाने के कांग्रेस नेतृत्व के फैसले से यह भी स्पष्ट है कि पायलट को मनाने की कोशिशें अब थम गई हैं। पायलट और उनके समर्थकों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई तब की गई जब सीएम अशोक गहलोत ने विधायकों की पर्याप्त संख्या अपने साथ होने का भरोसा दिलाया। इससे यह भी स्पष्ट है कि कांग्रेस की पहली प्राथमिकता राज्य में अपनी सरकार बचाना है, न कि पार्टी में गुटबाजी से हो रहे नुकसान को रोकने के लिए कोई प्रभावी कदम उठाना।
हालांकि, कुछ वरिष्ठ कांग्रेस नेता पायलट के समर्थन में भी सामने आए हैं। पार्टी के प्रवक्ता रहे संजय झा जैसे नेताओं ने खुलकर कहा है कि 2018 के विधानसभा चुनावों के बाद पायलट को मुख्यमंत्री नहीं बनाना उनके साथ अन्याय था। पायलट ने पीसीसी अध्यक्ष रहते 2013 से लगातार प्रदेश की बीजेपी सरकार के खिलाफ संघर्ष किया था। गहलोत उस समय दिल्ली में थे, लेकिन जब सीएम बनाने की बात आई तो गहलोत बाजी मार ले गए।
पायलट नाराज हैं और गहलोत के साथ काम नहीं करना चाहते। उनके समर्थकों ने गहलोत के साथ-साथ पार्टी के प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे को भी कटघरे में खड़ा किया है। उनका आरोप है कि पांडे गहलोत के पक्ष में काम करते हैं और उनकी बात पार्टी आलाकमान तक नहीं पहुंचने देते। यानी पायलट और कांग्रेस नेतृत्व के बीच कम्युनिकेशन गैप लंबे समय से बना हुआ है, लेकिन इसे दूर करने की कोशिश पार्टी नेतृत्व ने नहीं की। पार्टी की अगली पीढ़ी के सबसे चमकदार और संघर्षशील युवा नेता को एक ऐसे सीएम के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया जो अपने राजनीतिक करियर के अंतिम पड़ाव की ओर अग्रसर है। कांग्रेस नेतृत्व को उनकी याद तब आई जब वे अपने समर्थक विधायकों के साथ मानेसर के होटल में पहुंच गए।
पायलट को उनके पदों से हटाने की जल्दबाजी में कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व भी अब प्वॉइंट ऑफ नो रिटर्न पर पहुंचता दिख रहा है, लेकिन वह ये मानने को तैयार नहीं कि नए नेताओं को आगे करना खुद उसके लिए भी जरूरी है। पार्टी गहलोत के बाद कौन के बारे में भी नहीं सोच रही। पायलट का अगला राजनीतिक कदम चाहे कुछ भी हो,उसके नतीजे चाहे जैसे भी हों, लेकिन यह कांग्रेस के लिए ठीक नहीं है- ये अभी से स्पष्ट है।