देशी जुगाड़ से बनाया धान निंदाई का कोनोवीडर “कहानी सच्ची है”
Last Updated: अगस्त 12, 2021 " 07:28 अपराह्न"
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देशी जुगाड़ से बनाया धान निंदाई का कोनोवीडर “कहानी सच्ची है”
कृषि अभियांत्रिकी का देशी नमूना पेश किया महिलाओं ने धान और सब्जी दोनों की निंदाई में कारगर होगा ये लोकल मेड कोनोवीडर
सागर | जिले में आजीविका महिला समूह ने चालू खरीफ मौसम में देशी सुगंधित धानों की खेती की बुनियाद रखी है। जिला कलेक्टर श्री दीपक सिंह की पहल पर सुगंधित धान के बाजार को ट्रेप करने के लिए ये शुरूआत हुई है। जिसमें डॉ. इच्छित गढ़पाले मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत की मदद से बालाघाट की प्रसिद्ध चिन्नौर प्रजाति के बीज को सागर में बोया गया है। इसके अलावा शहडोल से लाई गई लोहंदी, जीराफुल, कालाजीरा, विष्णुभोग, बासमती आदि धानों को भी उत्पादन के अलावा प्रगुणन्न में लिया गया है। धान के इन बीजों को श्रीविधि की नर्सरी लगाकर तैयार किया गया था और रोपित किया गया था। धान रूपाई के 7 वें, 14 वें और 21वे दिन कोनोवीडर ऑपरेशन किया जाता है परन्तु जिले में चूकि श्री विधि का प्रयोग नहीं किया गया है इस कारण कोनोवीडर मशीन जिसकी अनुमानित कीमत 1500-1800 रूप्ये कॉनोवीडर मशीन उपलबध नहीं है। अनूप तिवारी जिला प्रबंधक कृषि ने देशी जुगाड़ से किस प्रकार महिलायें कोनोवीडर तैयार कर सकती हैं इसका उन्हें आईडिया दिया। उस आइडिये को अमल करते हुए महिलाओं ने कीलें, खेत की लकड़ी बांस की मदद से सुन्दर कोनोवीडर तैयार कर लिया। यंत्र के निर्माण में सीएफटी पार्टनर के रूप में सहयोगी संस्था एसआरएम के श्री प्रदीप जैन ने आवश्यक सामग्री तत्काल महिलाओं को उपलब्ध करा दी और लगभग 450 रूप्ये की लागत से ये कोनोवीडर बनकर तैयार हो गया। धान के खेत में कोनोवीडर मिटटी को खोदकर मिटटी में हवा का संचरण बढ़ा देता है। खेत में उंगा कचरा मिटटी में मिक्स होकर बायोफेटेलाइजर बनाता है। वीडर से धान के पौधे में मैकेनिकल इंजरी होती है ये घाव धान के पौधों में नवीन कंसे फोड़ते हैं। इस प्रकार खरपतवार नासी के इस्तेमाल की तुलना में वीडर ऑपरेशन श्रेयशकर होता है। महिलाओं ने अपने धान के खेतों में एक-एक मीटर पर अरहर के पौधें को भी रोपित किया है। एसपीआई सिस्टम ऑफ पिजन पी इंटेसीफिकेशन वह विधि है जिसमें प्रति एकड़ मात्र डेढ़ सौ से दो सौ दाने अरहर के र्प्याप्त होते हैं 1 एकड़ में लगभग 4 हजार दाने अथवा अरहर के पौधे लगते हैं प्रत्येक पौधा आठ सौ से डेढ़ किलो तक पैदावार देता है। कृषि तकनीकी की दिशा में श्रीविधि से धान और अरहर दोनों की खेती कम लागत में बहुत अधिक उत्पादन देने वाली होती है। जलधार स्वयं सहायता समूह से जुड़ी ग्राम खैजरा बुद्धू की श्रीमती रामसखी विश्वकर्मा ने अपने खेत में आज वीडर ऑपरेशन कर इस नवाचार की शुरूआत की है। इस यंत्र को बनाने में कुल लागत 450 रूप्ये आई है। जिसमें अधिक कीमत कीलों की है बाकि लकड़ी स्थानीय है और कारपेंटर का शुल्क शामिल है। केसली विकासखण्ड में भी समूह की महिलाओं ने अपनी धान में कोनोवीडर यंत्र बनाना शुरू किया है। हरीश दुबे, जिला परियोजना प्रबंधक के अनुसार आजीविका मिशन के माध्यम से महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए सतत नव प्रयोग किये जा रहे हैं। समूह की महिलाओं ने आजीविका के विभिन्न आयामों में अपनी धाक जमाई है। एक ओर जहां महिलायें गैर कृषि क्षेत्र में सिलाई, सैनेटरी नैपकिन निर्माण, अचार, पापड़, बरी इकाई, सौंदर्य प्रसांधन, सैनेटाइजर, साबुन, पीपीई किट आदि बना रहीं हैं वहीं दूसरी ओर वे कृषि के क्षेत्र में भी नवाचार अपना रहीं हैं। जिला पंचायत मुख्यकार्यपालन अधिकारी, डॉ. इच्छित गढ़पाले का कहना है कि समूह की महिलाओं को आर्थिक रूप से संपन्न करने के लिए अब उन्हें और बड़े दायित्व दिये जा रहे हैं। 56 उपार्जन केन्द्रों का महिला समूहों ने सफल संचालन किया। महिलायें उचित मूल्य की दुकानों का संचालन गौ-शालाओं का प्रबंधन, मनरेगा के अंतर्गत नर्सरी निर्माण कर फलदार पौधों के उत्पादन जैसे कार्यों को संचालित कर रहीं हैंं।