रतलाम/ धामनोद नगर परिषद में ‘वेतन’ दो प्रकार के – एक जो मिलता है, एक जो मिलना चाहिए

  
Last Updated:  जून 7, 2026 " 12:52 पूर्वाह्न"

Ratlam: धामनोद नगर परिषद में ‘वेतन’ दो प्रकार के – एक जो मिलता है, एक जो मिलना चाहिए, -सफाई कर्मी 10 जून को हड़ताल पर

रतलाम, (मुकेश चौधरी)। नगर परिषद धामनोद ने ‘एक देश, एक कानून’ की तर्ज पर ‘एक दफ्तर, दो वेतन सिस्टम’ लागू कर दिया है? पहला सिस्टम सफाई कर्मचारियों के लिए है – जिसमें वेतन दो-दो महीने तक ‘ध्यान मुद्रा’ में चला जाता है। दूसरा सिस्टम कुर्सी वालों के लिए है – जिसमें वेतन तो छोड़ो, मजाल है कोई ‘हाय’ भी कर ले?

दो माह से खाली जेब लेकर शहर साफ कर रहे सफाई कर्मचारी अब थक गए हैं। 10 जून को वे सांकेतिक हड़ताल करेंगे। सांकेतिक इसलिए क्योंकि असली हड़ताल तो वेतन ने कर रखी है -आने से।

सवाल ये है कि विभाग प्रमुख हड़ताल क्यों नहीं करते?

इसका जवाब नगर परिषद के ‘अलिखित संविधान’ में छुपा है:

वेतन’ की परिभाषा अलग है: सफाई कर्मचारी के लिए वेतन मतलब 10-12 हजार रुपये जिससे चूल्हा जलता है। विभाग प्रमुख के लिए ‘वेतन’ एक औपचारिकता है। असली आय तो ‘फाइल की स्पीड’ ‘एनओसी का वजन’ और ‘ठेके के प्रतिशत’ से आती है। तनख्वाह तो बस इनकम टैक्स रिटर्न में दिखाने के लिए होती है। गाड़ी का पेट्रोल तो ‘आकस्मिक निधि’ से भर ही रहा है।

नुकसान किसका होगा: सफाई कर्मचारी काम बंद करे तो शहर में कचरा फैलेगा, जनता चिल्लाएगी, दबाव बनेगा। अगर विभाग प्रमुख हड़ताल कर दे तो फाइलें अपनी जगह सोती रहेंगी। ठेके पास नहीं होंगे। कमीशन रुकेगा। जनता को फर्क नहीं पड़ेगा, उल्टा साहब का ‘साइड इनकम’ बंद हो जाएगा।

सिस्टम’ की समझ: कर्मचारी को लगता है हक मांगने से मिलता है। विभाग प्रमुख सिस्टम का हिस्सा है। उसे पता है वेतन लेट होना ‘तकनीकी खराबी’ है, नीयत की खराबी
नहीं। इसका इलाज हड़ताल नहीं, ‘संबंध’ है। तनख्वाह आ जाएगी।

‘इज्जत’ का सवाल: कर्मचारी सड़क पर बैठे तो मजबूरी। साहब धरने पर बैठे तो न्यूज बन जाएगी – “वेतन के लिए तरसे अफसर”। साहब की इज्जत उसकी कुर्सी की हैसियत से है, तनख्वाह की स्लिप से नहीं। और हैसियत ‘सेटिंग’ से बनती है।

एक सफाई कर्मी ने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर कहा: साहब कहते हैं प्रोसेस में है। लगता है हमारी तनख्वाह की फाइल को मोक्ष मिल गया है।

कर्मचारियों की मांग सीधी है – दो माह का बकाया दो और आगे समय पर दो। पर यहाँ ‘समय’ शब्द सिर्फ जनता के लिए है। टैक्स देने का समय। देने का समय आए तो घड़ी स्लो हो जाती है।

इसलिए नियम साफ है: जिसके घर में आटा खत्म हो वो हड़ताल करे। जिसके घर ‘नोट’ छपते हों, वो मुस्कुराकर फाइल निपटाए।

10 जून को सफाई कर्मचारी सड़क पर ‘वेतन दो’ चिल्लाएंगे। और विभाग प्रमुख? वो वातानुकूलित केबिन में बैठकर इसी हड़ताल की ‘रिपोर्ट’ बनाकर ऊपर भेजेंगे। साथ में लिखेंगे: “स्थिति नियंत्रण में है।”
क्योंकि यहाँ नियंत्रण उसी का है, जिसका वेतन कभी नहीं रुकता। इसे कहते हैं ‘न्याय’। नगर परिषद वाला न्याय।

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