सुप्रीम कोर्ट का SC-ST एक्ट पर ऐतिहासिक फैसला:- धर्म परिवर्तन करने पर खत्म होगा SC दर्जा, नहीं मिलेंगे आरक्षण और कानूनी लाभ

  
Last Updated:  मार्च 25, 2026 " 03:12 अपराह्न"

सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षित वर्ग और धर्मांतरण से जुड़े मसले पर मंगलवार को स्पष्ट एवं महत्त्वपूर्ण फैसला सुनाया है। इसके मुताबिक, हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म छोड़कर कोई दूसरा धर्म अपनाने वाला अनुसूचित जाति मूल का व्यक्ति या परिवार संरक्षण, आरक्षण या अन्य वैधानिक लाभ का पात्र होने का दावा नहीं कर सकता है।

ऐसा इसलिए, क्योंकि संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार धर्म परिवर्तन के साथ ही उसका अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त हो जाता है।

शीर्ष अदालत के इस फैसले को लंबे समय से चल रही उस बहस पर निर्णायक माना जा रहा है, जिसमें यह दावा किया जा रहा था कि भले ही किसी व्यक्ति ने धर्म परिवर्तन कर लिया हो, लेकिन उसकी मूल सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर उसे आरक्षित श्रेणी का लाभ मिलना चाहिए। ऐसे मामले अक्सर सामने आते रहते हैं कि धर्म परिवर्तन के बाद भी लोग खुद को आरक्षित श्रेणी का लाभ पाने का हकदार मानते हैं। मगर अदालत ने अपने निर्णय में साफ कर दिया है कि इस तरह का कोई भी दावा मान्य नहीं हो सकता है।

दरअसल, यह मामला आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh) से सर्वाेच्च्च न्यायालय पहुंचा था। याचिकाकर्ता ने ईसाई धर्म अपना लिया था, इसके बावजूद वह खुद को अनुसूचित जाति का सदस्य बताते हुए अनुसूचित जाति एवं जनजाति अधिनियम के तहत संरक्षण प्रावधानों के लाभ की मांग कर रहा था। आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने इससे संबंधित याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि धर्म परिवर्तन के बाद किसी व्यक्ति को अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं दिया जा सकता।

इसे जागरूकता का अभाव कहा जाएगा या व्यवस्था में अस्पष्टता कि आरक्षित वर्ग से जुड़े लोगों में आज भी यह भ्रम है कि अगर वे हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर कोई दूसरा धर्म अपना लेते हैं, तब भी उन्हें अनुसूचित जाति एवं जनजाति अधिनियम का लाभ मिलता रहेगा। मगर अब शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि ऐसे व्यक्ति को संविधान, संसद या राज्य विधानमंडल के किसी कानून के तहत कोई भी वैधानिक लाभ, संरक्षण या आरक्षण नहीं दिया जा सकता। यह पूरी तरह प्रतिबंधित है और इसमें कोई अपवाद नहीं है।

गौरतलब है कि धर्म परिवर्तन करने वालों की जातिगत स्थिति से जुड़े सवाल केवल अदालतों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इस मसले को राजनीतिक नफा-नुकसान के चश्मे से भी देखा जाता है। कर्नाटक (Karnataka) के राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की ओर से पिछले दिनों की गई जाति गणना में उस वक्त विवाद खड़ा हो गया था, जब ईसाई समुदाय के अंतर्गत तैंतीस जातियों को सूचीबद्ध किया गया। तब विपक्ष के विरोध और राज्यपाल के सुझाव के बाद इन समुदायों को सूची से हटा दिया गया, हालांकि चार श्रेणियों को बरकरार रखा गया।

ऐसे में यह सवाल भी महत्त्वपूर्ण है कि आरक्षित वर्ग और धर्मांतरण (religious conversion) से जुड़े मसले पर शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में जिस तरह स्थिति स्पष्ट की है, क्या इस तरह की पहल सरकारी स्तर पर नहीं की जा सकती थी? जबकि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 में स्पष्ट किया गया है कि किसी भी धर्म को छोड़कर दूसरा धर्म अपनाने पर अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत समाप्त हो जाता है। अनुसूचित जाति एवं जनजाति अधिनियम का सुरक्षात्मक ढांचा उन लोगों तक विस्तारित नहीं किया जा सकता, जिन्होंने धर्म परिवर्तन करके इस सामाजिक और कानूनी श्रेणी से बाहर निकलने का विकल्प चुना है।

हिन्दू से ईसाई बनने वाले नहीं दर्ज करा सकते एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा:- सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने मंगलवार को आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है जिसमें हिन्दू से ईसाई बनने वाली व्यक्ति द्वारा एससी-एसटी एक्ट (SC-ST Act) के तहत दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया गया था। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि SC का दर्जा केवल हिन्दू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए है। इनके अलावा किसी अन्य धर्म में कनवर्ट होने वालों का एससी का दर्जा खत्म हो जाता है।

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