कोई सांड से भिड़ा तो किसी ने जान पर खेलकर बचाई दूसरों की जिंदगी, वीरता पुरस्‍कार पाने वालों की कहानी-

  
Last Updated:  जनवरी 25, 2021 " 04:20 अपराह्न"

इन बच्‍चों की उम्र अभी खेलने-कूदने की है, मगर जो कारनामे उन्‍होंने किए हैं वो बड़े-बड़े नहीं कर पाते। अपनी जान को दांव पर लगाकर दूसरों को बचाना सबके बस की बात नहीं। बहुत लोग मूकदर्शक बने रहते हैं, मगर ये बच्‍चे नहीं। गणतंत्र दिवस से पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुल 32 बच्‍चों को राष्‍ट्रीय बाल पुरस्‍कार से नवाजा। इनमें से तीन को बहादुरी के लिए सम्‍मान मिला है। प्रधानमंत्री वीडियो कॉन्‍फ्रेसिंग के जरिए राष्‍ट्रीय बाल पुरस्‍कार पाने वालों से मुखातिब भी हुए। आइए आपको बताते हैं कि बहादुरी के लिए सम्‍मान पाने वाले ये बच्‍चे कौन हैं और इन्‍होंने क्‍या किया है।

कामेश्वर जगन्नाथ वाघमारे: दो बच्‍चों को डूबने से बचाया

कामेश्वर जगन्नाथ वाघमारे उन बच्‍चों के लिए देवदूत बनकर आए थे जो नदी में डूब रहे थे। हुआ यूं कि एक दिन कंधार तालुका में घोडा गांव के पास बहने वाली नदी में तीन बच्‍चे नहा रहे थे। बहाव में फंसकर तीनों डूबने लगे। कामेश्वर उधर से गुजर रहे थे। उन्‍होंने जैसे ही बच्‍चों को डूबते देखा, एक पल न सोचा और नदी में छलांग लगा दी। दो बच्‍चों को बचाने में वह कामयाब रहे मगर तीसरे ने दम तोड़ दिया। इस बात का मलाल कामेश्वर को आज भी है। उन्‍हें महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री उद्धव ठाकरे भी सम्‍मानित कर चुके हैं।

कुंवर दिव्‍यांश सिंह: जान पर खेल गए, बहन की जिंदगी बचाई

उत्‍तर प्रदेश के बाराबंकी में रहने वाले कुंवर दिव्‍यांश सिंह की उम्र महज 13 साल है। मगर उन्‍होंने जो किया, उसकी हिम्‍मत बड़े-बड़े नहीं दिखा पाते। वह एक दिन स्‍कूल से वापस लौट रहे थे। साथ में उनकी छोटी बहन और कुछ बच्‍चे और थे। एक सांड ने उन सबपर हमला कर दिया। छोटी बहन को फंसा देख दिव्‍यांश ने अपने बैग को हथियार बनाया और सांड से भिड़ गए। आखिर में वह सांड को वहां से भगाने में कामयाब रहे। दिव्‍यांश को उनके इस कारनामे के लिए प्रदेश और राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कई पुरस्‍कार मिले। इस साल उन्‍हें राष्‍ट्रीय बाल पुरस्‍कार में ‘बहादुरी’ कैटेगरी में सम्‍मान मिला है।

ज्‍योति कुमारी: बीमार पिता को बिठाकर 1200KM चलाई साइकल

-1200km-

कोरोना वायरस के चलते पूरे देश में जब लॉकडाउन लगा, उस वक्‍त 15 साल की ज्‍योति गुरुग्राम में रहती थीं। पिता बीमार थे। यहां काम-धंधे का कुछ इंतजाम था नहीं तो भूखों मरने की नौबत आ गई। ज्‍योति ने हिम्‍मत दिखाई। बीमार पिता को पीछे बिठाया और एक सेकेंड-हैड साइकल के पेडल मारने शुरू किए। मंजिल थी बिहार का दरभंगा जिला। ज्‍योति लगातार सात दिन तक साइकल चलाती रहीं। बीच-बीच में कहीं आराम करतीं। करीब 1,200 किलोमीटर का यह सफर जब पूरा हुआ तो ज्‍योति पूरे देश की मीडिया में छा चुकी थीं। ज्‍योति की तारीफ अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप की बेटी इवांका ने भी की थी। उनपर फिल्‍म बनाने की तैयारियां थी।

 2,072 total views

Facebook Comments

Related Posts

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *