उज्जैन को कोरोना के कहर से बचाने कलेक्टर ने नगर पूजा शुरु की, अब तक 27 मौतें हो चुकी हैं

  
Last Updated:  मई 3, 2020 " 03:38 अपराह्न"

उज्जैन: 3 मई 2020( स्पष्ट खबर ) कोरोना वायरस इन्फेक्शन को रोकने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित किए गए लॉक डाउन के कारण उज्जैन में इस बार महा अष्टमी के दिन नगर पूजा की शुरुआत नहीं हो पाई थी। इसके बाद उज्जैन में कोरोनावायरस के इंफेक्शन के मामले सामने आना शुरू हुए और एक के बाद एक लगातार 27 मौतें हो गई और 7 लोग अभी भी अस्पताल में गंभीर हालत में है। अंततः आज कलेक्टर शशांक मिश्र ने चौबीस खंबा माता मंदिर पहुंचकर नगर पूजा की विधिवत शुरुआत की।

उज्जैन के लोगों की रक्षा के लिए 1000 साल से की जाती है नगर पूजा

राजा विक्रमादित्य के शासनकाल से ही नगर में सुख-समृद्धि और आपदा-विपदा से लोगों की रक्षा के लिए नगर पूजा की परंपरा चली आ रही है। यह मंदिर करीब 1000 साल पुराना है। यहां पर आपदा-विपदा से लोग बचे रहे इसलिए नगर पूजा की जाती है। 

कलेक्टर स्वयं माता को मदिरा अर्पित करते हैं

यह मंदिर विश्व का संभवत: एक मात्र ऐसा मंदिर है, जहां महाअष्टमी के दिन माता को मदिरा चढ़ाई जाती है। सैकड़ों भक्तों की मौजूदगी में ढोल-ढमाकों के साथ गुदरी स्थित चौबीस खंभा माता मंदिर से नगर पूजा की शुरुआत की जाती है। कलेक्टर मदिरा की धार चढ़ाकर पूजा शुरू करते हैं। 

26 किलोमीटर पैदल यात्रा और 40 मंदिरों में होती है पूजा

यह पूजा माता, भैरव व हनुमान मंदिर मिलाकर कुल 40 मंदिरों में होती है। 26 किलोमीटर की पैदल यात्रा के बाद संपन्न होने वाली इस पूजा में 5 किलो सिंदूर, दो डिब्बे तेल, 25 बोतल मदिरा सहित 39 प्रकार की विशेष पूजन सामग्री रखी जाती है। हालांकि इस वर्ष काेरोना संकट के कारण यह पूजा नहीं हो सकी थी।

प्रवेश द्वार पर विराजित हैं माता महामाया और माता महालाया

महाकाल वन के मुख्य प्रवेश द्वार पर विराजित माता महामाया और माता महालाया चौबीस खंभा माता मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। यहां पर मंदिर के भीतर 24 काले पत्थरों के खंभे हैं, इसीलिए इसे 24 खंभा माता मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह उज्जैन नगर में प्रवेश करने का प्राचीन द्वार हुआ करता था। पहले इसके आसपास परकोटा हुआ करता था। तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध उज्जैन या प्राचीन अवंतिका के चारों द्वार पर भैरव तथा देवी विराजित हैं, जो आपदा-विपदा से नगर की रक्षा करते हैं। चौबीस खंभा माता भी उनमें से एक हैं। यह मंदिर करीब 1000 साल पुराना है। नगर की सीमाओं पर स्थित इन देवी मंदिरों में राजा विक्रमादित्य के समय से नगर की सुरक्षा के लिए पूजन और मदिरा चढ़ाए जाने की परंपरा चली आ रही है।

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