देवोत्थान एकादशी/ देवउठनी ग्यारस की कथा एवं पूजा विधि –

  
Last Updated:  नवम्बर 25, 2020 " 09:04 पूर्वाह्न"

धर्म समाज| कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवोत्थान एकादशी कहते हैं, आम बोलचाल की भाषा इसे देवउठनी ग्यारस भी कहा जाता है। देवोत्थान एकादशी की तिथि को श्री हरि विष्णु का चतुर्मास संपन्न होता है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु निद्रा से जाग जाते हैं। इस दिन तुलसी-शालिग्राम विवाह का आयोजन किया जाता है और इसी के साथ सामाजिक शुभ कार्यों की शुरुआत हो जाती है।

देवप्रबोधिनी एकादशी/ देवोत्थान एकादशी/ देवउठनी ग्यारस की कथा 

एक राजा था। उसके राज्य में प्रजा सुखी थी। एकादशी को कोई भी अन्न नहीं बेचता था। सभी फलाहार करते थे। एक बार भगवान ने राजा की परीक्षा लेनी चाही। भगवान ने एक सुंदरी का रूप धारण किया तथा सड़क पर बैठ गए। तभी राजा उधर से निकला और सुंदरी को देख चकित रह गया। उसने पूछा- हे सुंदरी! तुम कौन हो और इस तरह यहां क्यों बैठी हो? तब सुंदर स्त्री बने भगवान बोले- मैं निराश्रिता हूं। नगर में मेरा कोई जाना-पहचाना नहीं है, किससे सहायता मांगू? राजा उसके रूप पर मोहित हो गया था। वह बोला- तुम मेरे महल में चलकर मेरी रानी बनकर रहो। सुंदरी बोली- मैं तुम्हारी बात मानूंगी, पर तुम्हें राज्य का अधिकार मुझे सौंपना होगा। राज्य पर मेरा पूर्ण अधिकार होगा। मैं जो भी बनाऊंगी, तुम्हें खाना होगा। राजा उसके रूप पर मोहित था, अतः उसकी सभी शर्तें स्वीकार कर लीं। अगले दिन एकादशी थी। रानी ने हुक्म दिया कि बाजारों में अन्य दिनों की तरह अन्न बेचा जाए। उसने घर में मांस-मछली आदि पकवाए तथा परोस कर राजा से खाने के लिए कहा। यह देखकर राजा बोला- रानी! आज एकादशी है। मैं तो केवल फलाहार ही करूंगा। तब रानी ने शर्त की याद दिलाई और बोली- या तो खाना खाओ, नहीं तो मैं बड़े राजकुमार का सिर काट दूंगी। राजा ने अपनी स्थिति बड़ी रानी से कही तो बड़ी रानी बोली- महाराज! धर्म न छोड़ें, बड़े राजकुमार का सिर दे दें। पुत्र तो फिर मिल जाएगा, पर धर्म नहीं मिलेगा। इसी दौरान बड़ा राजकुमार खेलकर आ गया। मां की आंखों में आंसू देखकर वह रोने का कारण पूछने लगा तो मां ने उसे सारी वस्तुस्थिति बता दी। तब वह बोला- मैं सिर देने के लिए तैयार हूं। पिताजी के धर्म की रक्षा होगी, जरूर होगी। राजा दुःखी मन से राजकुमार का सिर देने को तैयार हुआ तो रानी के रूप से भगवान विष्णु ने प्रकट होकर असली बात बताई- राजन! तुम इस कठिन परीक्षा में पास हुए। भगवान ने प्रसन्न मन से राजा से वर मांगने को कहा तो राजा बोला- आपका दिया सब कुछ है। हमारा उद्धार करें। उसी समय वहां एक विमान उतरा। राजा ने अपना राज्य पुत्र को सौंप दिया और विमान में बैठकर परम धाम को चला गया। इस प्रकार जो भी मनुष्य धर्म की रक्षा के लिए किसी भी प्रकार के त्याग के लिए तैयार होता है भगवान विष्णु उसे अपने धाम में विशेष स्थान देते हैं। बोलो, श्री हरि विष्णु भगवान की जय।

देवोत्थान एकादशी/ देवउठनी ग्यारस तुलसी विवाह का मुहूर्त

एकादशी तिथि प्रारंभ – 25 नवंबर 2020, बुधवार को सुबह 2.42 बजे सेएकादशी तिथि समाप्त – 26 नवंबर 2020, गुरुवार को सुबह 5.10 बजेद्वादशी तिथि प्रारंभ – 26 नवंबर 2020, गुरुवार को सुबह 5.10 बजे सेद्वादशी तिथि समाप्त – 27 नवंबर 2020, शुक्रवार को सुबह 7.46 बजे 

देवोत्थान एकादशी/ देवउठनी ग्यारस की पूजा विधि

एकादशी व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि करें और व्रत संकल्प लें।-इसके बाद भगवान विष्णु की अराधना करें।-अब भगवान विष्णु के सामने दीप-धूप जलाएं। फिर उन्हें फल, फूल और भोग अर्पित करें।-मान्यता है कि एकादशी के दिन भगवान विष्णु को तुलसी जरुरी अर्पित करनी चाहिए।-शाम को विष्णु जी की अराधना करते हुए विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करें। -एकादशी के दिन पूर्व संध्या को व्रती को सिर्फ सात्विक भोजन करना चाहिए। -एकादशी के दिन व्रत के दौरान अन्न का सेवन नहीं किया जाता।-एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित है।-एकादशी का व्रत खोलने के बाद ब्राहम्णों को दान-दक्षिणा दें। 

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