फतवे से निकाह खत्म नहीं होगा, तलाक का अधिकार सिर्फ अदालत को: हाईकोर्ट
Last Updated: अगस्त 8, 2026 " 01:12 अपराह्न"
जबलपुर बेंच ने कहा- धार्मिक राय कानूनी आदेश नहीं, मुस्लिम विवाह-विच्छेद अधिनियम के तहत ही होगी कानूनी प्रक्रिया
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट (Madhya Pradesh High Court) ने मुस्लिम समुदाय में तलाक को लेकर एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल फतवे के आधार पर निकाह को समाप्त नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि शादी को कानूनी रूप से खत्म करने का अधिकार केवल सक्षम न्यायालय के पास है।
न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकलपीठ ने भोपाल स्थित दारुल-दफा मस्जिद कमेटी द्वारा जारी फतवे से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।
मामले का विवरण याचिकाकर्ता पति ने अदालत में दावा किया था कि मस्जिद कमेटी द्वारा निकाह समाप्त करने के संबंध में जारी फतवे के आधार पर उनका विवाह खत्म माना जाए। वहीं पत्नी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि फतवा कानूनी तलाक का जरिया नहीं हो सकता।
सुनवाई के बाद कोर्ट ने कहा कि किसी धार्मिक संस्था या व्यक्ति द्वारा जारी फतवा अपने आप में कानूनी आदेश नहीं होता। इसलिए केवल फतवा जारी होने से पति-पत्नी का विवाह कानूनी रूप से समाप्त नहीं माना जा सकता।
कोर्ट की अहम टिप्पणियां धार्मिक राय – कानूनी आदेश: फतवा केवल धार्मिक राय या मार्गदर्शन है। अधिकार क्षेत्र: किसी मदरसा, धार्मिक संस्था या मस्जिद कमेटी को कानूनी रूप से निकाह समाप्त करने का अधिकार नहीं है। कानूनी प्रक्रिया जरूरी: तलाक को कानूनी मान्यता दिलाने के लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। विकल्प खुला: यदि पति तलाक चाहता है तो वह पारिवारिक न्यायालय में मुस्लिम विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1939 के तहत याचिका दाखिल कर सकता है।
अदालत ने इस मामले में दायर मौजूदा मुकदमे को दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के तहत खारिज कर दिया। साथ ही पति को कानूनी प्रक्रिया अपनाते हुए दोबारा याचिका दाखिल करने की स्वतंत्रता भी दी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से यह स्पष्ट संदेश गया है कि धार्मिक और कानूनी क्षेत्र अलग-अलग हैं और वैवाहिक संबंधों के विघटन में अंतिम निर्णय न्यायपालिका का ही होगा।