वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में अब दक्षिण भारतीय मंदिरों की तर्ज़ पर स्पर्श दर्शन के लिए ड्रेस कोड लागू होगा

  
Last Updated:  जनवरी 13, 2020 " 01:37 अपराह्न"

रामचंद्र पांडेय का कहना था कि महाकालेश्वर मंदिर में ये ड्रेस कोड लागू है. उनके मुताबिक़, उत्तर भारतीय मंदिरों, ख़ासकर ज्योतिर्लिंगों में इसे इसलिए इतना कठोर नहीं बनाया गया है क्योंकि वहां मौसम ठंडा रहता है. वो कहते हैं, "केदारनाथ के दर्शन के लिए इतनी कठोरता से पालन भले ही न हो सके लेकिन वाराणसी में इस तरह की स्थिति ज़्यादा दिनों तक नहीं रहती है. इसलिए यहां लागू करने में कोई दिक़्क़त नहीं होनी चाहिए."

वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में अब दक्षिण भारतीय मंदिरों की तर्ज़ पर स्पर्श दर्शन के लिए ड्रेस कोड लागू होगा.

रविवार को राज्य के धर्मार्थ कार्य राज्य मंत्री नीलकंठ तिवारी, मंदिर प्रशासन और काशी विद्वत परिषद की बैठक में फ़ैसला लिया गया कि गर्भ गृह में स्पर्श दर्शन के लिए पुरुषों को धोती और महिलाओं को साड़ी में आना अनिवार्य किया जाएगा. यह व्यवस्था मकर संक्रांति के बाद लागू की जाएगी.

काशी विश्वनाथ मंदिर के सीईओ विशाल सिंह ने बीबीसी को बताया, “मंदिर प्रशासन और विद्वत परिषद की ओर से यह प्रस्ताव आया था कि ज्योतिर्लिंग का स्पर्श करने के लिए बिना सिले हुए वस्त्र पहनकर ही लोग आएं. यह सुझाव सिर्फ़ गर्भ गृह के भीतर मूर्ति का स्पर्श करने वालों और पूजन करने वालों पर लागू होगा. गर्भगृह के बाहर से दर्शन करने वालों पर लागू नहीं होगा. मकर संक्रांति के बाद इसे लागू किया जाएगा. अभी इसका बहुत प्रचार-प्रसार नहीं हो पाया है इसलिए मंदिर प्रशासन ऐसे वस्त्रों की व्यवस्था अभी ख़ुद ही करेगा. यह बाद में भी जारी रहेगी. जिन लोगों के पास ऐसे वस्त्र होंगे, वो उन्हें पहनकर आ सकते हैं.”

ड्रेस कोड के मुताबिक़, पुरुष पारंपरिक परिधान यानी धोती और अंगवस्त्र (जो सिला हुआ न हो) और महिलाएं साड़ी पहनकर ही गर्भ गृह में स्पर्श दर्शन कर सकेंगी. जींस, पैंट, शर्ट, सूट, कोट इत्यादि परिधानों में जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर में सिर्फ़ दर्शन की व्यवस्था होगी, उन्हें गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति नहीं होगी.

सीईओ विशाल सिंह ने बताया कि श्रद्धालुओं के लिए स्पर्श दर्शन का समय भी एक घंटे से बढ़ाकर सात घंटे करने का निर्णय लिया गया है.

15 जनवरी यानी मकर संक्रांति से नई व्यवस्था लागू हो जाएगी. रविवार को प्रदेश के पर्यटन और धर्मार्थ कार्य राज्यमंत्री डॉ. नीलकंठ तिवारी की अध्यक्षता में हुई मंदिर प्रशासन और काशी विद्वत परिषद की बैठक में यह निर्णय लिया गया.

काशी विश्वनाथ मंदिर में स्पर्श दर्शन के लिए अभी तक कोई ड्रेस कोड नहीं था. हालांकि ज़्यादातर लोग स्पर्श दर्शन के लिए इसी तरह के परिधान में जाया करते थे. इस तरह की व्यवस्था ज़्यादातर दक्षिण भारतीय मंदिरों में लागू है लेकिन उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर में भी स्पर्श दर्शन के लिए बिना सिले हुए वस्त्र धारण करने का नियम है.

काशी विद्वत परिषद के सदस्य रामचंद्र पांडेय ने बताया कि उत्तर भारतीय मंदिरों में ये परंपरा नहीं है लेकिन ज्योतिर्लिंगों के स्पर्श के लिए इस तरह की व्यवस्था का लोग बिना किसी नियम के ही पालन करते हैं.

उन्होंने बताया, “मंदिरों की प्रतिमा का स्पर्श हमेशा नहीं हो सकता. पूजा के लिए शुद्ध मन और मस्तिष्क के साथ शरीर का भी शुद्ध होना आवश्यक है. ड्रेस कोड इसीलिए बनाने का प्रस्ताव दिया गया कि यदि कोई व्यक्ति न जान रहा हो तो भी उसे पता चले. हालांकि आमतौर पर स्पर्श दर्शन के दौरान ज़्यादातर लोग इसी वेशभूषा में आते हैं.”

स्थानीय पत्रकार गिरीश दुबे कहते हैं कि सुबह के वक़्त जब स्पर्श दर्शन का समय तय है, उस वक़्त जो लोग भी आते हैं, उनमें से ज़्यादातर धोती और साड़ी में ही आते हैं. स्पर्श दर्शन के लिए जो भी आता है, उसे पता है कि इसी ड्रेस में जाना है.

उनके मुताबिक़, “अब चूंकि मंदिर प्रशासन ने स्पर्श दर्शन का समय बढ़ा दिया है तो ज़ाहिर है, ज़्यादा लोग आएंगे और उनमें सबको यह बात नहीं मालूम होगी. विद्वत परिषद का सुझाव इसीलिए आया था कि श्रद्धालुओं को टोकना पड़े, इससे अच्छा उसके लिए नियम ही बना दिया जाए.”

गिरीश दुबे बताते हैं कि यह प्रस्ताव पिछले काफ़ी दिनों से चला आ रहा था लेकिन अभी तक इसके लिए कोई औपचारिक बैठक नहीं हुई थी. विद्वत परिषद ने मंदिर के अर्चकों का भी ड्रेस कोड निर्धारित करने का सुझाव दिया ताकि भीड़ में भी अर्चक आसानी से पहचाने जा सकें।

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