होली के दो दिन बाद मनी दिवाली, रात भर गरजी तोपें; सन्नाटे को चीरती रहीं गोलियां-तलवारों की आवाजे
Last Updated: मार्च 12, 2020 " 01:29 अपराह्न"
मेनार (उदयपुर)। रात के सन्नाटे में देर तक बंदूकों की ठांय-ठांय और तलवारों की टन्न-टन्न की आवाज सन्नाटे को चीरती रही। यह नजारा था उदयपुर जिले के मेनार गांव का जहां बुधवार रात को जमरा बीज के मौके पर बारूद की होली और तलवारों से जबरी गैर खेली गई।
इस दौरान बंदूकों-तोपों और पटाखे फोड़े गए तो तलवारें चलाई गईं। मेवाड़ में होली के बाद आने वाली चैत्र कृष्ण द्वितीय को जमरा बीज कहा जाता है। इसे उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। पूरा गांव किसी दुल्हन की तरह सजाया जाता है। इस मौके पर गांव के लोग तलवार से गैर नृत्य करते हैं।
गैर नृत्य से पूर्व ओंकारेश्वर चौराहे पर जाजम बिछा कर अमल कसुंबे की रस्म अदा की गई। शाम को मशालचियों की अगुवाई में सफेद धोती-कुर्ता और कसूमल पाग पहने लोगों के पांच दल पांच रास्तों से चारभुजा मंदिर के सामने चौराहा पर पहुंचे।
चौराहा पर पटाखों के धमाकों के साथ बंदूकें गरजती रहीं। रात 10:00 बजे बाद सभी लोग अलग-अलग रास्तों से मशालें, बंदूकें और तलवारों से लैस थे। बंदूक दागते हुए सेना के आक्रमण किए जाने के रूप में ओंकारेश्वर चौराहे पहुंचे जहां लोगों ने बंदूक व तोप के गोले दागे।
इसके बाद जैन समुदाय ने अबीर गुलाल से लोगों का स्वागत किया। महिलाएं सिर पर पानी का लोटा लिए एवं पुरुष आतिशबाजी करते हुए बोचरी माता की घाटी गए। जहां गांव के शौर्य और वीरता के इतिहास का वाचन किया गया। इस दौरान गांव की महिलाएं और युवतियां थम्ब चौक पर फेरावतों की कड़ी सुरक्षा में मुख्य होली को शीतल करने की रस्म अदा की। इसके बाद सभी लोग ओंकारेश्वर चौराहा आए। यहां लोगों ने एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में लकड़ी लेकर तलवारों की जबरी गैर खेली।
ऐसे शुरू हुई परंपरा
मेनार मूलतया मनारिया ब्राह्मणों का गांव है। कहा जाता है कि एक बार इस गांव के लोगों ने मुगल सेना को हराया था। तलवारों को गैर नृत्य मुगल आक्रमणकारियों पर स्थानीय वीरों की विजय की खुशी मेंजमरा बीज चैत्र कृष्ण द्वितीया पर्व पर किया जाता है। ये लोग बांकिये और ढोल की लय पर एक हाथ में तलवार और दूसरे में लाठी लेकर गैर खेलते हैं। इस दिन गांव को दुल्हन की तरह सजाया जाता है।